Thursday, October 1, 2026
WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.43.49
WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.43.50 (1)
WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.43.50
WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.43.50 (2)

सच्चे का बोलबाला: वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव, निलेश शर्मा और साजिद हाशमी अदालत से बरी

WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.52 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.53
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.52 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.49 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.52
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.53 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.53 (1)

सच्चे का बोलबाला: वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव, निलेश शर्मा और साजिद हाशमी अदालत से बरी

ढाई साल चली कानूनी लड़ाई का अंत, अभियोजन आरोप सिद्ध करने में रहा असफल; गवाहों के बयानों से पुलिस कार्रवाई पर भी उठे सवाल, पत्रकारों में हर्ष का माहौल

रायपुर / बिलासपुर । विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव, निलेश शर्मा और साजिद हाशमी को बिलासपुर की अदालत ने वर्ष 2023 में दर्ज मामले में बरी कर दिया है। करीब ढाई वर्ष तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद सामने आए इस फैसले से तीनों पत्रकारों को बड़ी न्यायिक राहत मिली है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अभियोजन पक्ष मामले में लगाए गए आरोपों को अदालत के समक्ष सिद्ध नहीं कर सका।

यह मामला उस समय सामने आया था जब छत्तीसगढ़ में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सत्ता में थी। मामले को लेकर बचाव पक्ष की ओर से शुरू से यह दावा किया जाता रहा कि भ्रष्टाचार और सत्ता-प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर पत्रकारिता करने के कारण तीनों पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की गई। हालांकि इस राजनीतिक प्रेरणा के आरोप को बचाव पक्ष के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

ढाई साल तक चली कानूनी लड़ाई

मामला दर्ज होने के बाद तीनों पत्रकारों को लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। बचाव पक्ष लगातार अभियोजन के साक्ष्यों और पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाता रहा।

अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठाए गए। अंततः अदालत के फैसले में अभियोजन आरोपों को सिद्ध करने में सफल नहीं रहा और तीनों पत्रकारों को बरी कर दिया गया।

गवाहों के बयान बने अहम कड़ी

बचाव पक्ष के अनुसार, सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए गए कुछ गवाहों के बयान मामले की जांच प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण रहे।

बचाव पक्ष का दावा है कि कुछ लोग अपने गुम हुए मोबाइल की सूचना देने के लिए पुलिस थाने पहुंचे थे। वहां उनसे कथित रूप से कुछ दस्तावेजों अथवा कोरे कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ प्रकरण तैयार करने में किया गया।

बचाव पक्ष के मुताबिक, संबंधित गवाहों ने अदालत में यह स्पष्ट किया कि उन्हें उस कथित प्रकरण की जानकारी नहीं थी और उन्होंने पत्रकारों के खिलाफ इस प्रकार की कोई शिकायत नहीं की थी।

यदि ये बातें न्यायालय के आदेश में दर्ज निष्कर्षों के अनुरूप हैं, तो जांच प्रक्रिया और दस्तावेजी साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में भी गवाहों के बयानों को मामले का महत्वपूर्ण पहलू बताया गया है।

बचाव पक्ष ने राजनीतिक दबाव का लगाया आरोप

तीनों पत्रकारों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता श्रीनिवास राव ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार से संबंधित खबरों के प्रकाशन और प्रसारण को रोकने के लिए पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दबाव बनाने की कोशिश की गई।

बचाव पक्ष का आरोप रहा कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने राजनीतिक दबाव में गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की और पत्रकारों को कानूनी प्रक्रिया में उलझाया गया।

हालांकि राजनीतिक दबाव अथवा जानबूझकर झूठा प्रकरण दर्ज किए जाने जैसे आरोपों को अदालत के फैसले में दर्ज विशिष्ट निष्कर्षों के आधार पर ही अंतिम रूप से समझा जाना चाहिए। केवल बरी होने का फैसला अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि मामला राजनीतिक षड्यंत्र था।

अदालत के फैसले से पत्रकारों में राहत

फैसले के बाद प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकारों और पत्रकार संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। पत्रकारों से जुड़े लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण राहत बताया है।

पत्रकारों का कहना है कि समाचार प्रकाशित करना, भ्रष्टाचार के मामलों पर सवाल उठाना और सरकार अथवा प्रशासन की जवाबदेही तय करने की कोशिश लोकतांत्रिक पत्रकारिता का हिस्सा है। दूसरी ओर, किसी भी पत्रकार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में आरोपों की न्यायिक जांच और साक्ष्यों की परीक्षा कानून के अनुसार होना आवश्यक है।

सत्ता बदली, लेकिन सवाल कायम

सुनील नामदेव, निलेश शर्मा और साजिद हाशमी से जुड़े इस मामले ने एक बार फिर पत्रकारिता, पुलिस कार्रवाई और सत्ता-प्रशासन के संबंधों पर बहस को सामने ला दिया है।

वर्ष 2023 में जब मामला दर्ज हुआ, तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और मामला न्यायालय की प्रक्रिया से गुजरते हुए बरी होने के फैसले तक पहुंच चुका है।

इसलिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अदालत में अभियोजन पक्ष तीनों पत्रकारों के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं कर सका और उन्हें बरी कर दिया गया।

पत्रकारों के लिए कानूनी राहत, जांच प्रक्रिया पर बहस तेज

अदालत से बरी होने के बाद तीनों पत्रकारों के लिए करीब ढाई वर्ष लंबी कानूनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ है। लेकिन इस मामले के साथ पुलिस जांच, गवाहों के बयान, दस्तावेजों की विश्वसनीयता और पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जैसे मुद्दे भी चर्चा में हैं।

मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए अदालत के विस्तृत आदेश में दर्ज आरोपों, साक्ष्यों, गवाहों के बयान और न्यायालय द्वारा दिए गए कारणों का अध्ययन महत्वपूर्ण रहेगा।

फिलहाल न्यायिक परिणाम स्पष्ट है—सुनील नामदेव, निलेश शर्मा और साजिद हाशमी को संबंधित मामले में अदालत से बरी कर दिया गया है। ढाई साल की कानूनी लड़ाई के बाद आया यह फैसला तीनों पत्रकारों के लिए बड़ी न्यायिक राहत के रूप में सामने आया है।

“पहले फंसाओ, फिर लंबी कानूनी लड़ाई लड़वाओ—यह कैसी व्यवस्था?” : जितेन्द्र कुमार जायसवाल

वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार जायसवाल ने पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों और हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव, निलेश शर्मा एवं साजिद हाशमी के अदालत से बरी होने के घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को पहले किसी मामले में फंसा दिया जाए और फिर उसे वर्षों तक न्याय पाने के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह व्यवस्था और न्याय की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जितेन्द्र कुमार जायसवाल ने कहा कि “पहले फंसाओ, फिर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ो और वर्षों बाद जब अदालत से राहत मिले, तब जाकर न्याय मिले—आखिर यह कैसी परंपरा है?”

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल काम सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना, जनता की समस्याओं को सामने लाना तथा भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जानकारी समाज तक पहुंचाना है। जब पत्रकार अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए किसी प्रभावशाली व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तब उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने, डराने या पत्रकार की आवाज रोकने के लिए किया जाए तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।

“पत्रकारों को फंसाने के पुराने हथकंडे अब बदलने होंगे”

जायसवाल ने कहा कि पत्रकारों को कथित तौर पर षड्यंत्र के तहत फंसाए जाने की शिकायतें कोई नई बात नहीं हैं। इतिहास में भी पत्रकारों को अपने सवालों और लेखनी की कीमत चुकानी पड़ी है। लेकिन आज का समय बदल रहा है। कानून, तकनीक, न्यायिक व्यवस्था और नागरिकों में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पहले की तुलना में कहीं अधिक है।

उन्होंने कहा कि “पुराने हथकंडों से नई पत्रकारिता को नहीं दबाया जा सकता। यदि किसी पत्रकार के खिलाफ शिकायत है तो निष्पक्ष जांच हो, ठोस साक्ष्य जुटाए जाएं और कानून के अनुसार कार्रवाई हो। लेकिन पहले व्यक्ति को आरोपी बना देना और बाद में वर्षों तक उसे अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मजबूर करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।”

पुलिस की भूमिका पर भी उठाए सवाल

जायसवाल ने कहा कि पुलिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून लागू करने वाली महत्वपूर्ण संस्था है। पुलिस पर राजनीतिक अथवा किसी अन्य बाहरी दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष कार्रवाई करने की अपेक्षा रहती है।

उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि पुलिसिंग का तौर-तरीका नए कानून, नई तकनीक और बदलते लोकतांत्रिक मानकों के अनुरूप बदला जाए। किसी भी शिकायत को केवल राजनीतिक या प्रभावशाली पक्ष की शिकायत मानकर कार्रवाई करने के बजाय पुलिस को प्रत्येक मामले में स्वतंत्र रूप से तथ्यों, दस्तावेजों, डिजिटल साक्ष्यों और गवाहों की विश्वसनीयता की जांच करनी चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया—“आखिर कब तक पुलिस पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप लगते रहेंगे? कब तक पुलिस को राजनीति का मोहरा बनाए जाने की बातें सामने आती रहेंगी?”

“राजनीति अपनी जगह, कानून अपनी जगह”

जितेन्द्र कुमार जायसवाल ने कहा कि सत्ता में कोई भी दल हो, पत्रकारिता और कानून व्यवस्था को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से अलग रखना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि किसी सरकार या राजनीतिक दल की आलोचना करना और किसी अपराध की निष्पक्ष जांच करना दो अलग-अलग विषय हैं। राजनीति अपनी जगह होनी चाहिए और कानून अपनी जगह। यदि किसी पत्रकार ने अपराध किया है तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि पत्रकार ने कोई अपराध नहीं किया है तो उसे केवल उसकी पत्रकारिता, सवाल पूछने या किसी खबर के कारण कानूनी उत्पीड़न का सामना नहीं करना चाहिए।

“बदले की भावना नहीं, आम जनता को न्याय चाहिए”

जायसवाल ने कहा कि न्याय की लड़ाई को व्यक्तिगत बदले की भावना में बदलना भी उचित नहीं है। किसी भी मामले में यदि पिछली कार्रवाई गलत साबित होती है तो उसका समाधान भी कानून के दायरे में ही होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “हमें किसी से बदला नहीं चाहिए। हमें व्यवस्था में सुधार चाहिए। यदि कहीं गलत हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और जो भी दोषी हो, उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई हो। लेकिन निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर वर्षों तक परेशान करना भी न्याय नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा कि आम आदमी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या कोई भी नागरिक जब कानून के सामने जाता है तो उसे निष्पक्ष व्यवस्था का भरोसा होना चाहिए। न्याय केवल अदालत के अंतिम फैसले का नाम नहीं है, बल्कि निष्पक्ष जांच, उचित प्रक्रिया और नागरिक के सम्मान की रक्षा भी न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

“पत्रकारिता सवाल पूछती रहेगी”

जायसवाल ने कहा कि अदालत से पत्रकारों को मिली राहत यह संदेश देती है कि अंततः किसी भी मामले में साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया की कसौटी महत्वपूर्ण होती है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का दायित्व सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि जनता के सवालों को सामने रखना है। पत्रकार सवाल पूछते रहेंगे, लेकिन पत्रकारिता के साथ-साथ पत्रकारों को भी कानून और जिम्मेदार रिपोर्टिंग के मानकों का पालन करना होगा।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मजबूत पत्रकारिता और निष्पक्ष पुलिसिंग एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यक संस्थाएं हैं। इसलिए जरूरत टकराव की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहां पत्रकार निर्भीक होकर सवाल पूछ सके, पुलिस निष्पक्ष होकर जांच कर सके और आम नागरिक बिना भय के न्याय मांग सके।

“बदले की भावना को दरकिनार करिए, कानून को अपना काम करने दीजिए और आम जनता को न्याय जरूर मिलना चाहिए—यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।”

WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.36.11 (1)
WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.36.11 (2)
WhatsApp Image 2026-08-13 at 18.36.12
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.54
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.55 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.56 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.55
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.55 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.56 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.56
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.56 (3)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.57
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.58 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.57 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.58 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.57 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.50 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.49
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.59 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.50
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.58
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.59
WhatsApp Image 2026-08-14 at 18.09.51 (1)
Tej kumar Sahu
Tej kumar Sahuhttp://tej24cgnews.in
EDITOR - TEJ24CGNEWS MO.NO.6267583973
RELATED ARTICLES

बिलासपुर में होने जा रहा अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति का राष्ट्रीय अधिवेशन में बड़ी संख्या में शामिल होंगे रायगढ़ के पत्रकार…

बिलासपुर में होने जा रहा अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति का राष्ट्रीय अधिवेशन में बड़ी संख्या में शामिल होंगे रायगढ़ के पत्रकार... पत्रकारिता के स्वाभिमान...

सकरी थाने में पीड़ित परिवार को न्याय की गुहार, पुलिस के रवैये पर उठे सवाल….

सकरी थाने में पीड़ित परिवार को न्याय की गुहार, पुलिस के रवैये पर उठे सवाल.... भरनी परसदा में अनजान युवक की संदिग्ध गतिविधि से आक्रोशित...

कार्यालय पुलिस महानिरीक्षक, बिलासपुर रेंज (छ.ग.)*🔹*आईजी श्री राम गोपाल गर्ग बिलासपुर रेंज ने ली रेंज के सायबर थानों की समीक्षा बैठक;*

*प्रेस नोट**कार्यालय पुलिस महानिरीक्षक, बिलासपुर रेंज (छ.ग.)*🔹*आईजी श्री राम गोपाल गर्ग बिलासपुर रेंज ने ली रेंज के सायबर थानों की समीक्षा बैठक;*🔹 *साइबर पोर्टलों...

पत्रकारिता बचाओ संकल्प यात्रा पहुँची रतनपुर, अब हर जगह दिखने लगी पत्रकारों की एकता…

पत्रकारिता बचाओ संकल्प यात्रा पहुँची रतनपुर, अब हर जगह दिखने लगी पत्रकारों की एकता.... बिलासपुर - पत्रकारिता बचाओ संकल्प यात्रा पहुँची रतनपुर बिलासपुर के अंतर्गत...

LAILUNGA NEWS

गांधी जयंती से पहले लैलूंगा के गांधी चौक की खुली पोल

गांधी जयंती से पहले लैलूंगा के गांधी चौक की खुली पोल! गांधी प्रतिमा के सामने कचरे का ढेर, गड्ढों में कीचड़ और उखड़े टाइल्स… नगर...
Latest