Sunday, October 4, 2026
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लैलूंगा: सोनोग्राफी मशीन है, डॉक्टर भी है—but सेवा नहीं! तीन साल से ग्रामीणों का हक मारा जा रहा, जिला अस्पताल में भेज दी गई डॉक्टर साक्षी अहेर…

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लैलूंगा: सोनोग्राफी मशीन है, डॉक्टर भी है—but सेवा नहीं! तीन साल से ग्रामीणों का हक मारा जा रहा, जिला अस्पताल में भेज दी गई डॉक्टर साक्षी अहेर…



लैलूंगा/रायगढ़।
वनांचल क्षेत्र लैलूंगा, जो कि आदिवासी बहुल इलाका है, वहां की स्वास्थ्य सुविधाएं लगातार उपेक्षा और प्रशासनिक लापरवाही की शिकार हो रही हैं। सबसे बड़ा उदाहरण है सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लैलूंगा, जहां तीन साल पहले सोनोग्राफी मशीन तो भेज दी गई, लेकिन न तो डॉक्टर की स्थायी तैनाती हुई और न ही सेवा सुनिश्चित की गई। अब हालात यह हैं कि मशीन भी है, डॉक्टर भी है, वेतन भी लैलूंगा से दिया जा रहा है—लेकिन डॉक्टर साक्षी अहेर की सेवा जिला अस्पताल में ली जा रही है!

डॉ. साक्षी अहेर की पोस्टिंग लैलूंगा में है। स्वास्थ्य विभाग से जारी आदेश के अनुसार उनका कार्यस्थल लैलूंगा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, पर वे यहां पदस्थ होकर भी ड्यूटी पर नहीं आतीं। बताया जा रहा है कि उनका वेतन यहीं से जारी होता है, लेकिन सेवाएं रायगढ़ जिला अस्पताल को दी जा रही हैं। इस दोहरी व्यवस्था से लैलूंगा के ग्रामीण बेहद परेशान हैं।

तीन साल पहले सरकार ने लैलूंगा के स्वास्थ्य केंद्र में सोनोग्राफी मशीन भेजी थी ताकि गर्भवती महिलाओं और अन्य मरीजों को रायगढ़ या दूसरे शहरों की दौड़ न लगानी पड़े। लेकिन पहले डॉक्टर नहीं मिली, अब डॉक्टर मिली भी तो उनकी सेवाएं लैलूंगा को नहीं मिल रही हैं।

लोगों ने कई बार दी जानकारी, फिर भी कार्रवाई नहीं

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों द्वारा कई बार जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया गया। मांग की गई कि डॉ. साक्षी अहेर को नियमित रूप से लैलूंगा में पदस्थ किया जाए, ताकि सोनोग्राफी जैसी ज़रूरी सेवा ग्रामीणों को मिल सके। लेकिन नतीजा सिफर रहा।

कुछ महीनों पहले दबाव पड़ने पर महीने में एक बार सोनोग्राफी सेवा देने का आदेश निकाला गया, पर वो भी केवल दो बार चलकर बंद कर दी गई। इसका खामियाजा महिलाओं, गर्भवती माताओं और बीमार बुज़ुर्गों को भुगतना पड़ रहा है।

ग्रामीणों को रायगढ़ जाना पड़ता है, जेब पर भारी बोझ

लैलूंगा और आसपास के गांवों से हर महीने दर्जनों मरीज सोनोग्राफी कराने के लिए रायगढ़ जाने को मजबूर हैं। वहां एक सामान्य सोनोग्राफी के लिए 1200 रुपये तक की फीस ली जाती है, और अगर जल्दी करानी हो तो अतिरिक्त 400 रुपये भी देने पड़ते हैं। ग्रामीणों के लिए यह बोझ असहनीय है। खेती-किसानी पर निर्भर गरीब तबके के लोगों को या तो कर्ज लेकर इलाज कराना पड़ता है या फिर इलाज टालना पड़ता है, जिससे उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ता है।

दीपक सिदार ने उठाई आवाज, CHMO से की बातचीत

इस गंभीर मामले को लेकर जिला पंचायत उपाध्यक्ष दीपक सिदार ने भी मोर्चा संभाला है। उन्होंने जिला के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CHMO) से व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर डॉ. साक्षी अहेर को तत्काल लैलूंगा में पदस्थ करने की मांग रखी है। अधिकारियों ने एक सप्ताह का समय मांगा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या एक हफ्ते बाद भी कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर यह भी अन्य वादों की तरह केवल आश्वासन ही बनकर रह जाएगा?

स्वास्थ्य विभाग का रवैया सवालों के घेरे में

यह कोई पहली बार नहीं है जब लैलूंगा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में सरकार की योजनाएं केवल कागजों में दिखाई देती हैं। पोस्टिंग तो कर दी जाती है, लेकिन न डॉक्टर आते हैं, न नर्स, न दवाएं और न ही जरूरी उपकरणों का उपयोग हो पाता है। परिणामस्वरूप, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र के लोग सुविधाओं के अभाव में शहरों की ओर भागते हैं, जिससे आर्थिक, मानसिक और शारीरिक परेशानियों का बोझ बढ़ता जा रहा है।

ग्रामीणों की मांग – डॉक्टर को तुरंत भेजें लैलूंगा

लैलूंगा के ग्रामीणों ने अब यह मांग तेज कर दी है कि यदि डॉक्टर की पोस्टिंग लैलूंगा में हुई है और वेतन भी यहीं से जा रहा है, तो उनकी सेवाएं भी यहीं मिलनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो ग्रामीण आंदोलन का रास्ता अपनाने की चेतावनी भी दे रहे हैं।

सरकार और स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह तत्काल हस्तक्षेप कर लैलूंगा को उसका हक दिलाए। वरना यह विश्वास और व्यवस्था दोनों के पतन की दिशा में एक और कदम होगा।

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Tej kumar Sahu
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