लैलूंगा क्षेत्र में इन दिनों लाल ईंट का अवैध कारोबार खुलेआम धधक रहा है। बिना किसी वैध अनुमति के ईंट भट्टों का संचालन जोरों पर है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि राजस्व विभाग, खनिज विभाग और वन विभाग तीनों ही गहरी नींद में नजर आ रहे हैं।
जंगलों से बेतहाशा लकड़ियों की कटाई हो रही है। हर दिन हरियाली को काटकर भट्टों में झोंका जा रहा है, कृषि भूमि की कई फीट तक खुदाई की जा रही है जिससे पर्यावरण पर सीधा हमला हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि “दिन-दहाड़े पेड़ गिर रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं।”
हरियाली पर हमला, सिस्टम पर सवाल
जहां एक ओर सरकार “पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ” का संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। आरोप है कि वन विभाग के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से यह पूरा खेल चल रहा है, जिससे पर्यावरण लगातार प्रदूषित हो रहा है।
जनप्रतिनिधि भी खामोश!
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। मौन सहमति या मजबूरी?—यह सवाल अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।
“ईंट भट्टों की आग में जल रहा भविष्य!”
अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में लैलूंगा की हरियाली पूरी तरह खत्म हो सकती है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस “लाल ईंट के काले खेल” पर कब तक चुप्पी साधे रहता है या फिर कोई ठोस कदम उठाया जाता है।
जनता पूछ रही है—क्या कानून सिर्फ कागजों में है? या फिर ‘मिलीभगत’ की आग में सब कुछ जल चुका है?
“लाल ईंट का काला खेल!”—लैलूंगा में जंगल जल रहे, प्रशासन ‘ठंडा’
“न परमिशन, न कार्रवाई… फिर भी धड़ल्ले से सुलग रही लाल ईंट!”
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